राधा अष्टमी पर बरसाना में 20 लाख श्रद्धालुओं की तैयारी, 7 ज़ोन और 20 सेक्टर...
- 12h ago
मथुरा के थाना जमुनापार क्षेत्र स्थित पानीगांव में करीब 250 वर्ष पुराना ऐतिहासिक तीन दिवसीय वायगीर मेला परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ शुरू हो गया है। बलदेव छठ के अवसर पर आयोजित इस अनोखे मेले में अगले 72 घंटे तक वायगीरों की थाली की थाप और रामायण गायन से पूरा गांव भक्तिमय बना रहेगा।
पानीगांव के गंगा मंदिर, हनुमान बगीची और मदा अखाड़ा परिसर में वायगीर परंपरा के अनुसार थाली की थाप पर रामायण का अखंड गायन किया जा रहा है। मान्यता है कि इस विशेष साधना के माध्यम से कंठमाला, विषवेल और विषैले जीव-जंतुओं के काटने जैसी समस्याओं का पारंपरिक रूप से निःशुल्क उपचार किया जाता है।
मेले के दूसरे दिन वायगीर मंत्रोच्चार और झाड़-फूंक की परंपरा के तहत सर्पदंश पीड़ितों के लगाए गए अमर बंध खोलने की धार्मिक प्रक्रिया भी संपन्न करेंगे, जिसे देखने और उपचार कराने के लिए हजारों श्रद्धालु दूर-दराज से पहुंचते हैं।
हर वर्ष उत्तर प्रदेश के अलावा हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड से बड़ी संख्या में लोग इस ऐतिहासिक मेले में आते हैं। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पूर्व प्रधान और ग्रामीणों के सहयोग से विशाल भंडारे की व्यवस्था भी की गई है, जहां तीनों दिन निःशुल्क भोजन प्रसाद वितरित किया जाएगा।
मथुरा के थाना जमुनापार क्षेत्र स्थित पानीगांव में करीब 250 वर्ष पुराना ऐतिहासिक तीन दिवसीय वायगीर मेला परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ शुरू हो गया है। बलदेव छठ के अवसर पर आयोजित इस अनोखे मेले में अगले 72 घंटे तक वायगीरों की थाली की थाप और रामायण गायन से पूरा गांव भक्तिमय बना रहेगा। पानीगांव के गंगा मंदिर, हनुमान बगीची और मदा अखाड़ा परिसर में वायगीर परंपरा के अनुसार थाली की थाप पर रामायण का अखंड गायन किया जा रहा है। मान्यता है कि इस विशेष साधना के माध्यम से कंठमाला, विषवेल और विषैले जीव-जंतुओं के काटने जैसी समस्याओं का पारंपरिक रूप से निःशुल्क उपचार किया जाता है। मेले के दूसरे दिन वायगीर मंत्रोच्चार और झाड़-फूंक की परंपरा के तहत सर्पदंश पीड़ितों के लगाए गए अमर बंध खोलने की धार्मिक प्रक्रिया भी संपन्न करेंगे, जिसे देखने और उपचार कराने के लिए हजारों श्रद्धालु दूर-दराज से पहुंचते हैं। हर वर्ष उत्तर प्रदेश के अलावा हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड से बड़ी संख्या में लोग इस ऐतिहासिक मेले में आते हैं। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पूर्व प्रधान और ग्रामीणों के सहयोग से विशाल भंडारे की व्यवस्था भी की गई है, जहां तीनों दिन निःशुल्क भोजन प्रसाद वितरित किया जाएगा।
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