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- 11h ago
नई दिल्ली/नैनीताल। खगोल विज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए अगस्त का पहला सप्ताह बेहद खास रहने वाला है। 10P/Tempel 2 (टेम्पल-2) धूमकेतु पृथ्वी के अपेक्षाकृत करीब पहुंचेगा, जिससे आसमान में एक शानदार खगोलीय नज़ारा देखने को मिल सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार 2 और 3 अगस्त के आसपास यह धूमकेतु पृथ्वी के सबसे करीब होगा।
आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (ARIES), नैनीताल के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शशिभूषण पांडेय के अनुसार, यह धूमकेतु लगभग 5.5 वर्ष में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करता है, लेकिन पृथ्वी के इतनी निकट कई दशकों बाद पहुंचता है। वर्ष 1967 में भी यह लगभग इसी दूरी तक आया था। इस बार इसकी पृथ्वी से न्यूनतम दूरी करीब 6.19 करोड़ किलोमीटर रहने का अनुमान है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, सूर्य के करीब आने पर धूमकेतु की बर्फ गर्म होकर गैस और धूल में बदलने लगती है, जिससे उसके पीछे लंबी और चमकदार पूंछ बनती है। यही पूंछ धूमकेतु को आकर्षक स्वरूप देती है और इसे खगोलीय दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है।
हालांकि, यह धूमकेतु सामान्य आंखों से आसानी से दिखाई देने की संभावना कम है। इसे देखने के लिए छोटी दूरबीन (Small Telescope) या शक्तिशाली बाइनोकुलर की आवश्यकता होगी। साफ मौसम और शहर की रोशनी से दूर स्थान पर इसका अवलोकन बेहतर ढंग से किया जा सकेगा।
वैज्ञानिकों का कहना है कि धूमकेतुओं का पृथ्वी के अपेक्षाकृत निकट आना एक सामान्य खगोलीय घटना है और इससे पृथ्वी को कोई खतरा नहीं होता। ऐसे अवसर वैज्ञानिकों के लिए धूमकेतुओं की संरचना, गति और व्यवहार का अध्ययन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
नई दिल्ली/नैनीताल। खगोल विज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए अगस्त का पहला सप्ताह बेहद खास रहने वाला है। 10P/Tempel 2 (टेम्पल-2) धूमकेतु पृथ्वी के अपेक्षाकृत करीब पहुंचेगा, जिससे आसमान में एक शानदार खगोलीय नज़ारा देखने को मिल सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार 2 और 3 अगस्त के आसपास यह धूमकेतु पृथ्वी के सबसे करीब होगा। आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (ARIES), नैनीताल के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शशिभूषण पांडेय के अनुसार, यह धूमकेतु लगभग 5.5 वर्ष में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करता है, लेकिन पृथ्वी के इतनी निकट कई दशकों बाद पहुंचता है। वर्ष 1967 में भी यह लगभग इसी दूरी तक आया था। इस बार इसकी पृथ्वी से न्यूनतम दूरी करीब 6.19 करोड़ किलोमीटर रहने का अनुमान है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, सूर्य के करीब आने पर धूमकेतु की बर्फ गर्म होकर गैस और धूल में बदलने लगती है, जिससे उसके पीछे लंबी और चमकदार पूंछ बनती है। यही पूंछ धूमकेतु को आकर्षक स्वरूप देती है और इसे खगोलीय दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। हालांकि, यह धूमकेतु सामान्य आंखों से आसानी से दिखाई देने की संभावना कम है। इसे देखने के लिए छोटी दूरबीन (Small Telescope) या शक्तिशाली बाइनोकुलर की आवश्यकता होगी। साफ मौसम और शहर की रोशनी से दूर स्थान पर इसका अवलोकन बेहतर ढंग से किया जा सकेगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि धूमकेतुओं का पृथ्वी के अपेक्षाकृत निकट आना एक सामान्य खगोलीय घटना है और इससे पृथ्वी को कोई खतरा नहीं होता। ऐसे अवसर वैज्ञानिकों के लिए धूमकेतुओं की संरचना, गति और व्यवहार का अध्ययन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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