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Tuesday, 14 Apr 2026
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अनिवार्यता के विरोध में हाथों में किताब और कलम थामने वाली शिक्षिकाएं और शिक्षको का सैलाव जलती हुई मशालो को थामकर सड़कों पर

यह मामला टीईटी (Teacher Eligibility Test) की अनिवार्यता से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले के बाद अब उन शिक्षकों पर भी टीईटी पास करने का दबाव बढ़ गया है, जो शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) लागू होने से कई साल पहले ही सेवा में आ चुके थे।

इसी के विरोध में अखिल भारतीय संयुक्त शिक्षक महासंघ के बैनर तले सेठ बीएन पोद्दार इंटर कॉलेज से मथुरा के प्रमुख स्थल होली गेट तक मशाल जुलूस निकाला गया। इस दौरान बड़ी संख्या में शिक्षक और शिक्षिकाएं शामिल हुए और उन्होंने फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।

डॉ. अजय कृष्णा सारस्वत, देवेंद्र सारस्वत, रविंद्र चौधरी, बलवीर सिंह, गौरव यादव और राज कुमार शर्मा सहित कई शिक्षक नेताओं का कहना है कि कोई भी कानून लागू होने की तिथि से प्रभावी होना चाहिए, न कि पिछली तारीख से। उनका तर्क है कि 1 सितंबर 2025 को आए फैसले के बाद पुराने शिक्षकों पर टीईटी अनिवार्य करना न केवल असंवैधानिक है, बल्कि मानवीय अधिकारों का भी उल्लंघन है।

इस आंदोलन में जूनियर हाईस्कूल शिक्षक संघ, यूटा और प्राथमिक शिक्षक संघ समेत करीब एक दर्जन संगठनों ने भाग लिया। शिक्षक नेताओं ने कहा कि निर्वाचन, जनगणना और सरकारी सर्वे जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में शिक्षकों की सेवाएं ली जाती हैं, लेकिन जब उनके अधिकारों की बात आती है तो उनकी योग्यता पर सवाल उठाए जाते हैं।

खास बात यह रही कि बल्देव, फरह, नौहझील और नंदगांव जैसे दूरदराज ग्रामीण क्षेत्रों से भी हजारों शिक्षक और महिला शिक्षिकाएं इस आंदोलन में शामिल हुईं। उन्होंने अपने बच्चों के भविष्य की चिंता से ऊपर उठकर इस संघर्ष में भाग लिया और अपने अधिकारों की आवाज बुलंद की।

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