महावन में सांझी महोत्सव के चौथे दिन सांझी कला संरक्षण कार्यशाला और कवि सम्मेलन आयोजित हुआ। ब्रजभाषा की रचनाओं, हास्य-व्यंग्य और कविताओं ने श्रोताओं का मन मोह लिया। इस दौरान रसखान समाधि स्थल का अवलोकन कर कवियों को सम्मानित भी किया गया।
उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद और जीएलए विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सांझी कला संरक्षण कार्यशाला में दक्ष एजुकेशन इंस्टीट्यूट और खाजानी वूमंस इंस्टीट्यूट, मथुरा की करीब 40 छात्राओं ने भाग लिया। वृंदावन के सांझी कला विशेषज्ञ अमरेश चंद्र भट्ट ने छात्राओं को पेपर कटिंग यानी स्टेंसिल के माध्यम से सांझी बनाने की बारीकियां सिखाईं।
उन्होंने बताया कि सांझी ब्रज की प्राचीन लोककला है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के गाय चराकर लौटने पर उनके स्वागत में सांझी बनाई जाती थी। उन्होंने नई पीढ़ी को इस कला से जोड़ने और इसके संरक्षण पर जोर दिया।
शाम छह बजे ब्रज तीर्थ विकास परिषद की उपाध्यक्ष शैलजा कांत मिश्र और सीईओ लक्ष्मी नागप्पन ने रसखान समाधि स्थल का अवलोकन किया। इसके बाद उन्होंने कवि सम्मेलन में कवियों की रचनाएं सुनीं और सभी कवियों को पटका पहनाकर सम्मानित किया।
कवि डॉ. श्रीकृष्ण शरद ने ब्रजभूमि की महिमा का बखान किया, वहीं सत्य प्रकाश शर्मा ने अपनी रचना के माध्यम से सांझी परंपरा को शब्दों में पिरोया। राधा गोविंद पाठक, अशोक अज्ञ, डॉ. अजीव अंजुम, हरिओम शर्मा ‘हरि’, देवी प्रसाद गौड़ और संतोष रिचा ने भी अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं की तालियां बटोरीं। पूरा परिसर कविताओं, तालियों और ठहाकों से गूंज उठा।
अनीता सिकरवार ने कहा कि ब्रज में ऐसे आयोजन होते रहने चाहिए, ताकि विलुप्त होती लोककलाओं का संरक्षण किया जा सके और उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सके।
सीपी सिकरवार ने कार्यक्रम की जानकारी देते हुए सांझी महोत्सव के आयोजन और ब्रज की सांस्कृतिक परंपराओं के महत्व पर प्रकाश डाला।
महेश शर्मा ने भी सांझी कला और ब्रज की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से जुड़े विचार साझा किए।
सांझी महोत्सव के माध्यम से ब्रज की प्राचीन लोककला और साहित्यिक परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। कार्यशाला और कवि सम्मेलन ने कला, साहित्य और संस्कृति के अनूठे संगम की झलक प्रस्तुत की।