देश में लोकप्रिय मैसेजिंग ऐप Telegram को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा है कि Telegram का इस्तेमाल केवल मैसेजिंग के लिए नहीं, बल्कि पेपर लीक, संगठित अपराध, आतंकी गतिविधियों और अवैध नेटवर्क द्वारा भी किया जा रहा है। सरकार ने कोर्ट में दावा किया कि यह प्लेटफॉर्म अपराधियों के लिए पहचान छिपाने और बड़े नेटवर्क संचालित करने का आसान माध्यम बनता जा रहा है।
सरकार ने हाल ही में NEET-UG 2026 री-एग्जाम से पहले Telegram पर अस्थायी प्रतिबंध लगाया था। सरकार का कहना है कि कुछ चैनलों और समूहों के माध्यम से परीक्षा से जुड़े फर्जी दावे, पेपर लीक और धोखाधड़ी के प्रयास किए जा रहे थे। इसी कारण सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 69A के तहत कार्रवाई की गई।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र ने Telegram को "नया डार्क वेब" बताते हुए कहा कि प्लेटफॉर्म पर होने वाली कुछ गतिविधियों का पता लगाना और अपराधियों तक पहुंचना बेहद कठिन हो जाता है। सरकार ने यह भी कहा कि उसके पास ऐसे साक्ष्य हैं जिन्हें वह अदालत के समक्ष पेश करेगी।
वहीं Telegram ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया है। कंपनी का कहना है कि अस्थायी प्रतिबंध से करोड़ों सामान्य उपयोगकर्ता प्रभावित हुए हैं और यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर असर डालता है। Telegram के संस्थापक पावेल ड्यूरोव ने भी प्रतिबंध की आलोचना करते हुए कहा कि इससे गलत गतिविधियां रुकने के बजाय दूसरे प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट हो सकती हैं।
फिलहाल मामला अदालत में विचाराधीन है और सभी की नजरें दिल्ली हाईकोर्ट के अगले फैसले पर टिकी हैं। यह मामला केवल एक ऐप के प्रतिबंध तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म की स्वतंत्रता, सुरक्षा और जवाबदेही के बीच संतुलन से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है।